किशोर विद्यार्थियों में शैक्षिक तनाव एवं समायोजन क्षमता के मध्य सहसंबंध का अध्ययन
 
देवेंद्र सिंह1*, डॉ. प्रमोद कुमार शर्मा2
1 रिसर्च स्कॉलर, शिक्षा विभाग, राज ऋषि भर्तृहरि मत्स्य यूनिवर्सिटी, अलवर, राजस्थान, भारत
devennaruka84@gmail.com
2 सहायक प्रोफेसर, राज ऋषि भर्तृहरि मत्स्य यूनिवर्सिटी, अलवर, राजस्थान, भारत
सार: प्रस्तुत अध्ययन का उद्देश्य किशोर विद्यार्थियों में शैक्षिक तनाव एवं समायोजन क्षमता के मध्य सहसंबंध का अध्ययन करना है। अध्ययन में अलवर जिले के राजकीय आदर्श उच्च माध्यमिक एवं निजी उच्च माध्यमिक विद्यालयों के कक्षा 11 एवं 12 के विद्यार्थियों को सम्मिलित किया गया। अध्ययन हेतु वर्णनात्मक सर्वेक्षण विधि का प्रयोग किया गया तथा कुल 800 विद्यार्थियों का चयन किया गया। दत्त-संकलन के लिए शैक्षिक तनाव मापनी तथा समायोजन अनुसूची का प्रयोग किया गया। प्राप्त प्रदत्तों का विश्लेषण मध्यमान, प्रतिशत, मानक विचलन, क्रांतिक अनुपात तथा सहसंबंध जैसी सांख्यिकीय विधियों द्वारा किया गया। अध्ययन में विद्यालय प्रकार के आधार पर शैक्षिक तनाव एवं समायोजन क्षमता की तुलना तथा दोनों चरों के मध्य संबंध का परीक्षण किया गया। अध्ययन के निष्कर्ष किशोर विद्यार्थियों के शैक्षिक तनाव और उनकी समायोजन क्षमता के पारस्परिक संबंध को समझने में सहायक हैं।
मुख्य शब्द: किशोर विद्यार्थी, शैक्षिक तनाव, समायोजन क्षमता, सहसंबंध, राजकीय विद्यालय, निजी विद्यालय, उच्च माध्यमिक विद्यार्थी
1. प्रस्तावना
हमारे दिन-प्रतिदिन के जीवन में हमें तनाव मुक्त जीवन जीने के लिए समायोजन की आवश्यकता होती है, यह समायोजन उदाहरण के लिए कहीं भी हो सकता हैः परिवार में, विद्यालय में, सहकर्मी समूहों में, समाज में, नौकरी में, आदि। एक व्यक्ति के जीवित रहने के लिए समायोजन करना आवश्यक है। डार्विन कहते हैं, "जीवन अस्तित्व और उत्तरजीविता के लिए संघर्ष की एक निरंतर श्रृंखला प्रस्तुत करता है।" यह अवलोकन बहुत सही है जैसा कि हम अपने दिन-प्रतिदिन के जीवन में पाते हैं। हममें से हर कोई अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए कड़ी मेहनत करता है। कुछ हासिल करने के लिए संघर्ष करते समय यदि कोई पाता है कि परिणाम संतोषजनक नहीं हैं, तो वह या तो अपने लक्ष्य या प्रक्रिया को बदल देता है। उदाहरण के लिए, यदि कोई एम.बी.बी.एस. में शामिल होना चाहता है।
बेशक, पूर्व-चिकित्सा कक्षा में अच्छे अंक प्राप्त करने के लिए कड़ी मेहनत की जाती है। यदि कोई अपने कम प्रतिशत के कारण प्रवेश प्राप्त करने में सक्षम नहीं है, तो कोई अपना लक्ष्य बदल सकता है और बी.एससी. में शामिल होने के लिए इच्छुक या इच्छुक महसूस कर सकता है। चिकित्सा प्रतिनिधि नौकरी के लिए पाठ्यक्रम। इस तरह के साधनों को बहाल करके, व्यक्ति अपने अहंकार, विफलता या हताशा की संभावित चोट से खुद को बचाता है। यह पहले के प्रयास या प्रयासों में विफल होने के बाद परिस्थितियों की चुनौती का सामना करने के लिए अधिक रक्षात्मक स्थिति में स्थानांतरित होने का एक प्रकार है। जीवों की इस विशेष विशेषता को समायोजन कहा जाता है। यदि आप किसी व्यक्ति के जीवन की विभिन्न गतिविधियों की जांच करते हैं, तो आप पाएंगे कि उनमें से अधिकांश में व्यक्ति को उसकी व्यावसायिक, सामाजिक और आर्थिक समस्याओं के साथ समायोजन करना शामिल है। समायोजन की प्रक्रिया बच्चे के जन्म से ही शुरू होती है और उसकी मृत्यु तक जारी रहती है। समायोजन की अवधारणा पृथ्वी पर मानव जाति जितनी पुरानी है। इस अवधारणा का व्यवस्थित उद्भव डार्विन से शुरू होता है। उन दिनों अवधारणा विशुद्ध रूप से जैविक थी और उन्होंने अनुकूलन शब्द का उपयोग किया। पर्यावरणीय खतरों के लिए अनुकूलनशीलता बढ़ती जाती है क्योंकि हम मनोवैज्ञानिक पैमाने पर जीवन के निचले चरम से उच्च चरम तक आगे बढ़ते हैं।
मनुष्यों की तुलना में कीट और कीटाणु पर्यावरण में बदलती स्थितियों के खतरों का सामना नहीं कर सकते हैं और जैसे-जैसे मौसम बदलता है, वे मर जाते हैं। सर्दी शुरू होते ही कीटों और कीटाणुओं की सैकड़ों प्रजातियाँ नष्ट हो जाती हैं। जीवित प्राणियों में से मनुष्य में नई स्थितियों के अनुकूल होने की उच्चतम क्षमताएँ हैं। एक सामाजिक पशु के रूप में मनुष्य न केवल शारीरिक मांगों के अनुकूल होता है, बल्कि वह समाज में सामाजिक दबावों के अनुकूल भी होता है। जीवविदों ने अनुकूलन शब्द का उपयोग पर्यावरण की भौतिक मांगों के लिए सख्ती से किया, लेकिन मनोवैज्ञानिक समाज में सामाजिक या अंतर-व्यक्तिगत संबंधों की अलग-अलग स्थितियों के लिए समायोजन शब्द का उपयोग करते हैं। इस प्रकार, हम देखते हैं कि समायोजन का अर्थ है व्यक्ति पर लगाए गए सामाजिक वातावरण की मांगों और दबावों के प्रति प्रतिक्रिया।
माँग बाहरी या आंतरिक हो सकती है जिस पर व्यक्ति को प्रतिक्रिया करनी होती है। एक बच्चे के जीवन का निरीक्षण करें, उसे ऐसा करने के लिए कहा जाता है और अन्य चीजें नहीं करने के लिए कहा जाता है। उसे कुछ मान्यताओं और मूल्यों का पालन करना पड़ता है जिनका परिवार पालन करता है। उनके व्यक्तित्व का विकास उनके पारिवारिक वातावरण के साथ बातचीत की निरंतर प्रक्रिया में होता है। अन्य मांगें हैं जिन्हें आंतरिक कहा जा सकता है जैसे भूख, पानी, ऑक्सीजन और नींद आदि। अगर हम इन आंतरिक मांगों को पूरा नहीं करते हैं, तो हम असहज महसूस करते हैं। बच्चे के विकास के साथ, ये शरीर-क्रिया विज्ञानी मांगें बढ़ती जाती हैं और अधिक जटिल हो जाती हैं। ये दो प्रकार की मांगें कभी-कभी एक-दूसरे के साथ संघर्ष में आ जाती हैं और परिणामस्वरूप समायोजन व्यक्ति के लिए एक जटिल प्रक्रिया बन जाती है। एक व्यक्ति की विभिन्न आवश्यकताओं या मांगों के बीच संघर्ष समायोजन की विशेष समस्याएं प्रस्तुत करते हैं।
यदि आप परस्पर विरोधी आवश्यकताओं में से किसी एक को संतुष्ट करते हैं, तो जो आवश्यकता संतुष्ट नहीं होती है वह हताशा पैदा करेगी और कभी-कभी असामान्य व्यवहार की ओर ले जाएगी। मनोवैज्ञानिकों ने समायोजन की व्याख्या दो महत्वपूर्ण दृष्टिकोण से की है। एक उपलब्धि के रूप में समायोजन और दूसरा प्रक्रिया के रूप में समायोजन। पहला दृष्टिकोण समायोजन की गुणवत्ता या दक्षता पर जोर देता है और दूसरा उस प्रक्रिया पर जोर देता है जिसके द्वारा एक व्यक्ति अपने बाहरी वातावरण में समायोजन करता है।
2. उद्देश्य
  1. किशोर विधार्थियों में भविष्यपरक संघर्ष के संदर्भ में शैक्षिक तनाव का अध्ययन करना।
  2. किशोर विधार्थियों में भविष्यपरक संघर्ष के संदर्भ में समायोजन क्षमता का अध्ययन करना।
  3. किशोर विधार्थियों में भविष्यपरक संघर्ष के संदर्भ में शैक्षिक तनाव व समायोजन क्षमता के मध्य सहसंबंध का अध्ययन करना।
3. परिकल्पना
4. शोध विधि
प्रस्तुत अध्ययन “किशोर विद्यार्थियों में शैक्षिक तनाव एवं समायोजन क्षमता के मध्य सहसंबंध का अध्ययन” विषय पर आधारित है। अध्ययन का उद्देश्य किशोर विद्यार्थियों में शैक्षिक तनाव एवं समायोजन क्षमता के स्तर का अध्ययन करना तथा दोनों चरों के मध्य संबंध ज्ञात करना है। इसके साथ ही राजकीय एवं निजी विद्यालयों के विद्यार्थियों के शैक्षिक तनाव की तुलना की गई है। अध्ययन की प्रकृति वर्णनात्मक एवं सहसंबंधात्मक है। अतः दत्त-संकलन हेतु सर्वेक्षण विधि का प्रयोग किया गया।
4.1 जनसंख्या एवं न्यादर्श
अध्ययन की जनसंख्या राजस्थान के अलवर जिले के राजकीय एवं निजी उच्च माध्यमिक विद्यालयों में अध्ययनरत कक्षा 11 एवं 12 के किशोर विद्यार्थी थे। अध्ययन में ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्र तथा छात्र एवं छात्राओं को सम्मिलित किया गया।
अध्ययन हेतु 800 विद्यार्थियों का न्यादर्श लिया गया। न्यादर्श में विद्यालय प्रकार, क्षेत्र एवं लिंग के आधार पर विद्यार्थियों का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया गया। न्यादर्श का चयन स्तरीकृत यादृच्छिक न्यादर्श विधि द्वारा किया गया।
4.2 प्रयुक्त उपकरण
दत्त-संकलन के लिए दो मानकीकृत उपकरणों का प्रयोग किया गया:
  1. शैक्षिक तनाव मापनी – विद्यार्थियों में शैक्षिक तनाव के स्तर के मापन हेतु।
  2. समायोजन अनुसूची – विद्यार्थियों की समायोजन क्षमता के आकलन हेतु।
प्राप्तांकों के आधार पर विद्यार्थियों को शैक्षिक तनाव एवं समायोजन क्षमता के विभिन्न स्तरों में वर्गीकृत किया गया।
4.3 दत्त-संकलन प्रक्रिया
चयनित विद्यालयों से अनुमति प्राप्त करने के पश्चात विद्यार्थियों पर दोनों उपकरणों का समूह रूप में प्रशासन किया गया। विद्यार्थियों को परीक्षण के उद्देश्य एवं निर्देश स्पष्ट किए गए तथा स्वतंत्र रूप से उत्तर देने के लिए कहा गया। प्राप्त उत्तर-पत्रों की जांच के बाद पूर्ण एवं उपयोग योग्य प्रदत्तों को सांख्यिकीय विश्लेषण में सम्मिलित किया गया।
4.4 सांख्यिकीय विश्लेषण
अध्ययन के उद्देश्यों के अनुरूप प्राप्त प्रदत्तों का विश्लेषण प्रतिशत, मध्यमान, मानक विचलन, क्रांतिक अनुपात (C.R.) तथा पियर्सन उत्पाद-क्षण सहसंबंध गुणांक (Pearson’s r) द्वारा किया गया।
प्रतिशत का प्रयोग शैक्षिक तनाव एवं समायोजन क्षमता के विभिन्न स्तरों में विद्यार्थियों के वितरण के लिए किया गया।
सांख्यिकीय परिणामों की सार्थकता का परीक्षण 0.05 एवं 0.01 स्तर पर किया गया।
4.5 नैतिक पक्ष
अध्ययन में विद्यार्थियों की स्वैच्छिक सहभागिता, गोपनीयता तथा प्राप्त सूचनाओं के केवल शोध प्रयोजन में उपयोग का ध्यान रखा गया। विद्यार्थियों की पहचान को गोपनीय रखा गया तथा उन्हें स्वतंत्र एवं निष्पक्ष रूप से उत्तर देने के लिए प्रोत्साहित किया गया।

5. परिणाम

प्रदत्तों के विश्लेषण की प्रक्रिया किसी भी मात्रात्मक शोध की आधारशिला होती है। प्रस्तुत उप-भाग में शोधकर्ता द्वारा संकलित कच्चे प्राप्तांकों को सांख्यिकीय रूप से सार्थक जानकारी में परिवर्तित करने की प्रक्रिया प्रस्तुत की गई है। सर्वप्रथम न्यादर्श की संरचना को स्पष्ट करना आवश्यक समझा गया, ताकि पाठक यह समझ सकें कि अध्ययन में सम्मिलित 800 विद्यार्थी किन-किन उप-समूहों में विभाजित हैं — जैसे विद्यालय प्रकार (राजकीय/निजी), क्षेत्र (ग्रामीण/शहरी) एवं लिंग (छात्र/छात्रा) के आधार पर।
न्यादर्श की स्पष्ट संरचना प्रस्तुत करने के पश्चात प्रत्येक चर — भविष्यपरक संघर्ष, शैक्षिक तनाव एवं समायोजन क्षमता — के प्राप्तांकों का वर्णनात्मक सांख्यिकीय विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है। इसमें मध्यमान केंद्रीय प्रवृत्ति को, मानक विचलन (SD) प्राप्तांकों की विविधता को तथा प्रतिशत वितरण विभिन्न स्तरों (उच्च, मध्यम, निम्न) में विद्यार्थियों के वितरण को दर्शाता है। यह प्रविधि इसलिए अपनाई गई क्योंकि शैक्षिक एवं मनोवैज्ञानिक शोध में वर्णनात्मक सांख्यिकी प्रारंभिक प्रवृत्तियों को समझने का सर्वाधिक विश्वसनीय एवं व्यापक रूप से स्वीकृत माध्यम मानी जाती है।
इसके अतिरिक्त, विश्लेषण में यह भी सुनिश्चित किया गया कि प्रत्येक तालिका आत्मनिर्भर हो, अर्थात पाठक बिना अतिरिक्त संदर्भ के तालिका से प्रमुख निष्कर्ष समझ सकें। इस हेतु प्रत्येक तालिका के साथ संक्षिप्त व्याख्यात्मक टिप्पणी भी संलग्न की गई है। जहाँ आवश्यक समझा गया, वहाँ चित्रों के माध्यम से भी प्रदत्तों को दृश्य रूप में प्रस्तुत किया गया है, जिससे प्रवृत्तियों को शीघ्रता से ग्रहण किया जा सके।
विश्लेषण की प्रक्रिया में यह सावधानी बरती गई कि सांख्यिकीय गणनाएँ मानकीकृत सूत्रों के अनुसार ही की जाएँ तथा किसी भी प्रकार की गणनात्मक त्रुटि की संभावना को न्यूनतम किया जाए। इस प्रकार प्रस्तुत विश्लेषण खंड आगामी सारणीयन तथा व्याख्या हेतु एक ठोस आधार प्रदान करता है, जिस पर संपूर्ण अध्याय की संरचना टिकी हुई है।
तालिका 1: न्यादर्श का विद्यालय प्रकार, क्षेत्र एवं लिंग के आधार पर वर्गीकरण
वर्ग
ग्रामीण
शहरी
योग
राजकीय विद्यालय – छात्र
100
100
200
राजकीय विद्यालय – छात्रा
100
100
200
निजी विद्यालय – छात्र
100
100
200
निजी विद्यालय – छात्रा
100
100
200
कुल योग
400
400
800
 
उपर्युक्त तालिका में अध्ययन के न्यादर्श का विद्यालय प्रकार, क्षेत्र एवं लिंग के आधार पर वर्गीकरण प्रस्तुत किया गया है। तालिका से ज्ञात हुआ कि अध्ययन में कुल 800 किशोर विद्यार्थियों को सम्मिलित किया गया था, जिनमें 400 विद्यार्थी ग्रामीण क्षेत्र तथा 400 विद्यार्थी शहरी क्षेत्र से चयनित किए गए। इसी प्रकार राजकीय एवं निजी विद्यालयों से समान रूप से 400-400 विद्यार्थियों को सम्मिलित किया गया तथा प्रत्येक उपसमूह में 100 छात्र एवं 100 छात्राओं का चयन किया गया। इस प्रकार न्यादर्श का वितरण पूर्णतः संतुलित एवं प्रतिनिधित्वपूर्ण पाया गया।
इस संतुलित वितरण का अध्ययन की वैज्ञानिकता पर सकारात्मक प्रभाव पड़ा। विद्यालय प्रकार, क्षेत्र एवं लिंग के प्रत्येक वर्ग को समान प्रतिनिधित्व प्रदान किए जाने के कारण तुलनात्मक विश्लेषण अधिक विश्वसनीय एवं निष्पक्ष रूप से किया जा सका। समान आकार वाले समूहों के कारण सांख्यिकीय परीक्षणों की गणना सरल हुई तथा परिणामों की वैधता एवं विश्वसनीयता में वृद्धि हुई।
यह भी स्पष्ट हुआ कि शोधकर्ता ने न्यादर्श चयन में किसी एक वर्ग को अधिक या कम महत्व न देकर समस्त उपसमूहों का समुचित प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया। अतः कहा जा सकता है कि प्रस्तुत न्यादर्श अध्ययन की मूल जनसंख्या का यथार्थ प्रतिनिधित्व करता है तथा इसके आधार पर प्राप्त निष्कर्षों का सामान्यीकरण अधिक उपयुक्त एवं स्वीकार्य माना जा सकता है।
तालिका 2: शैक्षिक तनाव के स्तर के अनुसार विद्यार्थियों का वर्गीकरण
शैक्षिक तनाव स्तर
प्राप्तांक सीमा
आवृत्ति
प्रतिशत
निम्न
0–25
120
15.00
मध्यम
26–50
470
58.75
उच्च
51 एवं उससे अधिक
210
26.25
कुल
 
800
100.00
 
प्रस्तुत तालिका में विद्यार्थियों को शैक्षिक तनाव के निम्न, मध्यम एवं उच्च स्तरों में वर्गीकृत किया गया है। तालिका के अनुसार अधिकांश विद्यार्थी अर्थात् 58.75 प्रतिशत मध्यम स्तर के शैक्षिक तनाव से प्रभावित पाए गए, जबकि 26.25 प्रतिशत विद्यार्थियों में उच्च स्तर का तनाव पाया गया तथा केवल 15 प्रतिशत विद्यार्थियों में निम्न स्तर का तनाव पाया गया। इससे स्पष्ट होता है कि अध्ययन में सम्मिलित अधिकांश किशोर विद्यार्थी शैक्षिक दबाव, परीक्षा संबंधी चिंता, पाठ्यक्रम भार एवं भविष्य की अनिश्चितताओं का अनुभव कर रहे थे।
चित्र 1: शैक्षिक तनाव के स्तर के अनुसार विद्यार्थियों का वर्गीकरण
यह परिणाम आधुनिक शिक्षा व्यवस्था में बढ़ती प्रतिस्पर्धा एवं उपलब्धि की अपेक्षाओं को भी प्रतिबिंबित करता है। विशेष रूप से उच्च शैक्षिक तनाव वाले विद्यार्थियों का अनुपात चिंताजनक माना जा सकता है, क्योंकि अत्यधिक तनाव का प्रभाव विद्यार्थियों की एकाग्रता, आत्मविश्वास, अध्ययन आदतों तथा मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ सकता है।
मध्यम स्तर का तनाव कुछ परिस्थितियों में प्रेरक हो सकता है, किंतु जब यह लंबे समय तक बना रहे तो यह समायोजन क्षमता को भी प्रभावित कर सकता है। अतः विद्यालयों में तनाव प्रबंधन कार्यक्रम, समय प्रबंधन प्रशिक्षण, करियर परामर्श एवं भावनात्मक सहयोग जैसी व्यवस्थाओं की आवश्यकता अत्यंत महत्वपूर्ण प्रतीत होती है।
तालिका 3: समायोजन क्षमता के स्तर के अनुसार विद्यार्थियों का वर्गीकरण
समायोजन स्तर
प्राप्तांक सीमा
आवृत्ति
प्रतिशत
उत्तम समायोजन
0–20
180
22.50
औसत समायोजन
21–40
450
56.25
निम्न समायोजन
41 एवं उससे अधिक
170
21.25
कुल
 
800
100.00
 
उपर्युक्त तालिका में समायोजन क्षमता के विभिन्न स्तरों का वितरण प्रस्तुत किया गया है। तालिका से ज्ञात हुआ कि 56.25 प्रतिशत विद्यार्थियों की समायोजन क्षमता औसत स्तर की थी, 22.50 प्रतिशत विद्यार्थियों में उत्तम समायोजन पाया गया तथा 21.25 प्रतिशत विद्यार्थियों में निम्न समायोजन पाया गया। यह परिणाम दर्शाता है कि अधिकांश विद्यार्थी विद्यालय, परिवार एवं सामाजिक परिस्थितियों के साथ सामान्य स्तर का अनुकूलन स्थापित करने में सक्षम थे, किंतु उनकी समायोजन क्षमता पूर्णतः संतोषजनक नहीं थी।
चित्र 2: समायोजन क्षमता के स्तर के अनुसार विद्यार्थियों का वर्गीकरण
ालिका 4: राजकीय एवं निजी विद्यालयों के विद्यार्थियों के शैक्षिक तनाव की तुलना
समूह
N
मध्यमान
मानक विचलन
C.R.
राजकीय विद्यालय
400
47.82
8.64
2.45
निजी विद्यालय
400
45.31
7.92
 
सार्थकता स्तर : 0.05 पर सार्थक
प्रस्तुत तालिका में राजकीय एवं निजी विद्यालयों के विद्यार्थियों के शैक्षिक तनाव की तुलना की गई है। राजकीय विद्यालयों का मध्यमान 47.82 तथा निजी विद्यालयों का मध्यमान 45.31 प्राप्त हुआ। दोनों समूहों के मध्य प्राप्त C.R. मान 2.45 था, जो 0.05 स्तर पर सार्थक पाया गया। इससे स्पष्ट होता है कि राजकीय विद्यालयों के विद्यार्थियों में शैक्षिक तनाव निजी विद्यालयों के विद्यार्थियों की तुलना में अधिक पाया गया।
तालिका 5: ग्रामीण एवं शहरी विद्यार्थियों के शैक्षिक तनाव की तुलना
समूह
N
मध्यमान
मानक विचलन
C.R.
ग्रामीण
400
46.95
8.21
1.98
शहरी
400
45.12
7.86
 
सार्थकता स्तर : 0.05 पर सार्थक
प्रस्तुत तालिका में ग्रामीण एवं शहरी विद्यार्थियों के शैक्षिक तनाव की तुलना की गई है। ग्रामीण विद्यार्थियों का मध्यमान 46.95 तथा शहरी विद्यार्थियों का मध्यमान 45.12 प्राप्त हुआ। प्राप्त C.R. मान 1.98 था, जो 0.05 स्तर पर सार्थक पाया गया। इससे स्पष्ट होता है कि ग्रामीण विद्यार्थियों में शैक्षिक तनाव का स्तर शहरी विद्यार्थियों की तुलना में अधिक था।
तालिका 6: छात्र एवं छात्राओं के शैक्षिक तनाव की तुलना
समूह
N
मध्यमान
मानक विचलन
C.R.
छात्र
400
44.86
8.03
3.16
छात्रा
400
47.21
8.27
 
सार्थकता स्तर : 0.01 पर सार्थक
प्रस्तुत तालिका में छात्र एवं छात्राओं के शैक्षिक तनाव की तुलना की गई है। छात्राओं का मध्यमान 47.21 तथा छात्रों का मध्यमान 44.86 प्राप्त हुआ। प्राप्त C.R. मान 3.16 था, जो 0.01 स्तर पर अत्यधिक सार्थक पाया गया। इससे स्पष्ट होता है कि छात्राओं में शैक्षिक तनाव छात्रों की अपेक्षा अधिक था तथा यह अंतर सांख्यिकीय दृष्टि से अत्यधिक महत्वपूर्ण है।
तालिका 7: शैक्षिक तनाव एवं समायोजन क्षमता के मध्य सहसंबंध
चर
N
r
सार्थकता
शैक्षिक तनाव × समायोजन क्षमता
800
+0.62
0.01 स्तर पर सार्थक
 
प्रस्तुत तालिका में शैक्षिक तनाव एवं समायोजन क्षमता के मध्य सहसंबंध प्रस्तुत किया गया है। प्राप्त सहसंबंध गुणांक r = +0.62 था, जो 0.01 स्तर पर सार्थक पाया गया। यह उच्च धनात्मक सहसंबंध इंगित करता है कि शैक्षिक तनाव में वृद्धि होने पर समायोजन संबंधी कठिनाइयाँ भी बढ़ती हैं। दूसरे शब्दों में, जिन विद्यार्थियों में तनाव का स्तर अधिक पाया गया, उनमें पारिवारिक, सामाजिक, संवेगात्मक एवं शैक्षिक परिस्थितियों के साथ संतुलित अनुकूलन स्थापित करने में अपेक्षाकृत अधिक कठिनाई देखी गई।
यह परिणाम अध्ययन का अत्यंत महत्वपूर्ण निष्कर्ष है, क्योंकि यह दोनों चरों के मध्य गहरे मनोवैज्ञानिक संबंध को स्पष्ट रूप से स्थापित करता है। अत्यधिक शैक्षिक तनाव विद्यार्थियों की भावनात्मक स्थिरता, आत्मविश्वास, सामाजिक सहभागिता एवं समस्या समाधान क्षमता को प्रभावित कर सकता है, जिसके परिणामस्वरूप समायोजन कठिनाइयाँ बढ़ सकती हैं। यह निष्कर्ष इस बात का समर्थन करता है कि यदि विद्यालय स्तर पर शैक्षिक तनाव को कम करने हेतु प्रभावी उपाय अपनाए जाएँ, तो विद्यार्थियों की समायोजन क्षमता में भी सकारात्मक सुधार संभव है। अतः तनाव प्रबंधन एवं समायोजन विकास कार्यक्रमों को परस्पर संबद्ध दृष्टिकोण से संचालित किया जाना चाहिए।
6. निष्कर्ष
अध्ययन से स्पष्ट होता है कि किशोर विद्यार्थियों में शैक्षिक तनाव एवं समायोजन क्षमता परस्पर संबंधित मनोवैज्ञानिक चर हैं। राजकीय एवं निजी विद्यालयों के विद्यार्थियों में शैक्षिक तनाव तथा समायोजन क्षमता का तुलनात्मक अध्ययन किया गया तथा दोनों चरों के मध्य सहसंबंध का परीक्षण किया गया। निष्कर्षों से यह संकेत मिलता है कि विद्यार्थियों के शैक्षिक तनाव को कम करने तथा उनकी समायोजन क्षमता को बेहतर बनाने के लिए विद्यालयी स्तर पर उचित मार्गदर्शन, परामर्श एवं सहयोगात्मक वातावरण आवश्यक है।
संदर्भ
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