क्षार-उत्प्रेरित बेंजो[d]पाइरोलो[2,1-b]थायाज़ोल विषमचक्रीय यौगिकों का संश्लेषण
अनामिका प्रजापति1*, उमेश चेजारा2
1 सहायकप्रोफेसर, रसायनविज्ञानविभाग, राजकीय कन्या महाविद्यालय, तारानगर (चूरू)-राजस्थान, भारत
aonu27@gmail.com
2 व्याख्याता, भौतिकी विभाग, प्रधानमंत्री श्री एमजीजीएस जीनी, सूरजगढ़, झुंझुनू, राजस्थान, भारत
सारांश: इस शोध में विभिन्न प्रतिस्थापियों युक्त बेंजो[d]पाइरोलो[2,1-b]थायाज़ोल विषमचक्रीय यौगिकों के संश्लेषण हेतु एक सरल, प्रभावी एवं संक्रमण-धातु-मुक्त बहुघटक संश्लेषण विधि विकसित की गई। इस विधि में बेंजोथायाज़ोल एसीटोनाइट्राइल, विभिन्न ऐल्डिहाइड तथा आइसोसाइनाइड को क्षारकीय उत्प्रेरक की उपस्थिति में अभिक्रिया कराई गई, जिसमें पहले नौवेंजेल संघनन तथा उसके पश्चात 4+1 चक्रीय योग अभिक्रिया सम्पन्न हुई।
अभिक्रिया परिस्थितियों में पाइपरिडीन (0.1 समतुल्य) एवं एसिटिक अम्ल (0.2 समतुल्य) को बेंजीन में 80°C पर सर्वाधिक प्रभावी अनुकूल पाया गया। कम समय में अच्छी लब्धि, व्यापक क्रियाकारक क्षेत्र तथा संक्रमण धातु-मुक्त परिस्थितियाँ अभिक्रिया की प्रमुख विशेषताएँ हैं। अनुकूल परिस्थितियों में कुछ उत्पादों को कॉलम क्रोमैटोग्राफी के बिना क्रिस्टलीकरण द्वारा पृथक किया जा सका।
अध्ययन में यह भी पाया गया कि इलेक्ट्रॉन-आकर्षी समूह युक्त एरिल ऐल्डिहाइड सामान्यतः इलेक्ट्रॉन-दाता समूह युक्त ऐल्डिहाइड की तुलना में बेहतर लब्धि प्रदान करते हैं। संश्लेषित उत्पाद पर्याप्त रूप से स्थिर पाए गए और उन्हें कमरे के तापमान पर कई सप्ताह तक संग्रहीत किया जा सकता है। विकसित संश्लेषणात्मक विधि सरल एवं स्वच्छ होने के साथ-साथ बड़े पैमाने पर बेंजो[d]पाइरोलो[2,1-b]थायाज़ोल विषमचक्रीय यौगिकों के संश्लेषण के लिए उपयोगी हो सकती है।
हाल के वर्षों में विविधता-उन्मुख एवं प्रभावी संश्लेषण विधियों के विकास से संरचनात्मक एवं जैविक रूप से विविध यौगिकों की खोज को गति मिली है। इन विधियों का उद्देश्य कम समय में कम लागत और उच्च संरचनात्मक विविधता के साथ नवीन रासायनिक यौगिकों का विकास करना है।¹बेंजो[d]पाइरोलो[2,1-b]थायाज़ोल एक महत्त्वपूर्ण N,S-युक्त विषम चक्रीय संरचना है, जो औषधीय एवं प्राकृतिक उत्पादों में पाई जाती है। इसके व्युत्पन्न विभिन्न जैविक गतिविधियाँ प्रदर्शित करते हैं तथा अनेक औषधीय एवं कृषि-रसायनों में उपयोगी हैं। इसलिए ये यौगिक औषधीय एवं कार्बनिक रसायन अनुसंधान के महत्त्वपूर्ण लक्ष्य हैं।².
3a-(इंडोलिन-1-कार्बोनिल)-3,3a-डाइहाइड्रोबेंजो[d]पाइरोलो[2,1-b]थायाज़ोल-1(2H)-वनको काइनीसिन सेंट्रोमियर-संबद्ध प्रोटीन E (CENP-E) अवरोधक के रूप में पहचाना गया है। कोशिका चक्र की माइटोटिक प्रगति में इसकी भूमिका के कारण CENP-E कैंसररोधी औषधियों के विकास के लिए एक संभावित लक्ष्य के रूप में उभरा है।³ इसके अतिरिक्त, हाइड्रोपाइरोलो[2,1-b]बेंजोथायाज़ोल युक्त γ-लैक्टम यौगिकों को चूहों में बाइक्यूकुलिन-प्रेरित आक्षेपों के विरुद्ध आक्षेपरोधी (anticonvulsant) प्रभावी पाया गया है।⁴
2,3-बिस(हाइड्रॉक्सीमेथिल)बेंजो[d]पाइरोलो[2,1-b]थायाज़ोल तथा उनके बिस(एल्किलकार्बामेट) व्युत्पन्नों की एक नवीन श्रेणी को मानव ल्यूकेमिया एवं विभिन्न ठोस ट्यूमर कोशिकाओं की वृद्धि के विरुद्ध प्रभावी प्रतिप्रसारी (antiproliferative) एजेंट पाया गया। विशेष रूप से, 4-फ्लुओरोफेनिल तथा 4-क्लोरोफेनिल युक्त बिस(प्रोपाइलकार्बामेट) व्युत्पन्नों ने मानव स्तन कार्सिनोमा MX-1 ज़ेनोग्राफ्ट के in vivo अध्ययन में उल्लेखनीय प्रतिट्यूमर प्रभाव प्रदर्शित करते हुए पूर्ण ट्यूमर शमन किया। इन यौगिकों की प्रमुख क्रियाविधि DNA के अंतःश्रृंखला क्रॉस-लिंकिंग (DNA interstrand cross-linking) से संबंधित पाई गई।⁵
कार्य का उद्देश्य
प्रारंभ में यह परिकल्पना की गई कि यदि 2-एमिनो विषमचक्रीय यौगिक के स्थान पर विभिन्न 2-सक्रिय मेथिलीन युक्त विषमचक्रीय यौगिक का उपयोग किया जाए, तो औषधीय दृष्टि से महत्त्वपूर्ण नवीन विषमचक्रीय यौगिकों का निर्माण किया जा सकता है। (स्कीम-1)
स्कीम-1 : वांछित यौगिकों के लिए प्रस्तावित अभिक्रिया रुपरेखा ।
वांछित बेंजो[d]पाइरोलो[2,1-b]थायाज़ोल व्युत्पन्नों का संश्लेषण मृदु परिस्थितियों में नोवेंजेल संघनन के बाद 4+1 चक्रीय योग अभिक्रिया द्वारा किया गया। इसमें बेंजोथायाज़ोल एसीटोनाइट्राइल, ऐल्डिहाइड तथा आइसोसाइनाइड की क्षारकीय उत्प्रेरक की उपस्थिति में अभिक्रिया से उच्च-प्रतिस्थापित बेंजो[d]पाइरोलो[2,1-b]थायाज़ोल व्युत्पन्न प्राप्त हुए। (स्कीम 2)
स्कीम 2: क्षार-उत्प्रेरित बेंजो[d]पाइरोलो[2,1-b]थायाज़ोल विषमचक्रीय यौगिकों का संश्लेषण
इस विधि के प्रमुख लाभ हैं—संक्रमण धातु-मुक्त बहुघटक संश्लेषण, कम समय में उच्च लब्धि, व्यापक क्रियाकारक क्षेत्र तथा उत्पाद शुद्धिकरण हेतु कॉलम क्रोमैटोग्राफी की आवश्यकता न होना।
परिणाम एवं चर्चा
अभिक्रिया परिस्थितियों का अनुकूलन:
हमारे अध्ययन की शुरुआत प्रस्तावित अभिक्रिया के लिए उपयुक्त उत्प्रेरक एवं विलायक के चयन द्वारा अभिक्रिया परिस्थितियों के अनुकूलन से की गई। विभिन्न उत्प्रेरकों एवं विलायकों की जाँच की गई। विलायक एवं उत्प्रेरक के परीक्षण से यह पाया गया कि संघनन उत्पाद की अशुद्धि की उपस्थिति के कारण कॉलम क्रोमैटोग्राफी द्वारा शुद्धिकरण के बाद भी वांछित उत्पाद पूर्णतः शुद्ध प्राप्त नहीं हुआ।विभिन्न विलायकों के उपयोग द्वारा अनुकूलन करने पर बेंजीन एक उपयुक्त विलायक सिद्ध हुआ। इसके उपयोग से कॉलम क्रोमैटोग्राफी के बिना ही उत्पाद के क्रिस्टल प्राप्त किए जा सके।
परिक्षण परिणामों से यह पाया गया कि पाइपरिडीन (0.1 समतुल्य) तथा एसिटिक अम्ल (0.2 समतुल्य) का संयोजन 80°C पर नौवेंजेल संघनन तथा 4+1 चक्रीय योग अभिक्रिया के लिए सर्वाधिक प्रभावी प्रवर्तक (promoter) रहा।
यौगिक (4a) का संश्लेषण बेंजोथायाज़ोल एसीटोनाइट्राइल, 4-मेथॉक्सी बेंज़ैल्डिहाइड तथा साइक्लोहेक्सिल आइसोसाइनाइड की 80°C पर अभिक्रिया द्वारा किया गया। उत्पाद (4a) रंगहीन ठोस के रूप में 92% लब्धि के साथ प्राप्त हुआ तथा इसका गलनांक 256°C पाया गया।
यौगिक 4a की संरचना की पुष्टि इसके स्पेक्ट्रमी आँकड़ों के आधार पर की गई। CDCl₃ में 400 MHz पर 1H NMR स्पेक्ट्रम में 3.39 ppm पर Ha प्रोटॉन (=N–H) तथा 3.87 ppm पर Hb प्रोटॉन (-OCH₃) का संकेत प्राप्त हुआ। इसके साथ ऐल्डिहाइडिक प्रोटॉन के संकेत का लुप्त होना यौगिक 4a के निर्माण की पुष्टि करता है। (चित्र: a)इसी प्रकार, 13C NMR स्पेक्ट्रम (CDCl₃, 100 MHz) में 55.43 ppm पर Cₐ, 57.42 ppm पर Cb तथा 82.45 ppm पर Cc के विशिष्ट संकेतों की उपस्थिति यौगिक 4a के निर्माण की पुष्टि करती है। अणु में उपस्थित अन्य सभी प्रोटॉनों एवं कार्बनों के संकेत भी यौगिक 4a के संबंधित स्पेक्ट्रम में प्राप्त हुए।(चित्र: b)
चित्र: (a) CDCl₃ में 22°C पर 400 MHz पर रिकॉर्ड किए गए यौगिक 4a का 1H NMR स्पेक्ट्रम (b) यौगिक 4a का CDCl₃ में 100 MHz पर 13C NMR स्पेक्ट्रम।
संश्लेषण की सामान्यप्रयोगात्मक विधि:
2-ब्रोमोबेंज़ैल्डिहाइड (100 mg, 0.57 mmol) तथा 2-बेंजोथायाज़ोल एसीटोनाइट्राइल (100 mg, 0.57 mmol) को बेंजीन (1 mL) में लिया गया। इसके बाद पाइपरिडीन (4.87 mg, 0.05 mmol) तथा एसिटिक अम्ल (6.8 mg, 0.11 mmol) मिलाया गया। अंत में तृतीयक-ब्यूटाइल आइसोसाइनाइड (42.94 mg, 0.51 mmol) को अभिक्रिया मिश्रण को 70°C पर 1–2 घंटे तक चलाया। अभिक्रिया पूर्ण होने के बाद मिश्रण को सीलबंद RB (राउंड-बॉटम फ्लास्क) में रातभर स्थिर रखा गया। अगले दिन फ्लास्क के तल पर अवक्षेप (ppt) प्राप्त हुआ। अवक्षेप को हेक्सेन से दो बार तथा मेथेनॉल से एक बार धोकर उत्पाद को एकत्र किया गया।
टिप्पणी:
उत्पाद को कॉलम क्रोमैटोग्राफी द्वारा पूर्णतः पृथक नहीं किया जा सका, क्योंकि 2-ब्रोमोबेंज़ैल्डिहाइड एवं 2-बेंजोथायाज़ोल एसीटोनाइट्राइल से बनने वाले मध्यवर्ती तथा अंतिम उत्पाद का TLC पर लगभग समान स्थान (spot) था। अतः कॉलम क्रोमैटोग्राफी के बाद उत्पाद में मध्यवर्ती की अल्प मात्रा में अशुद्धि बनी रही।अभिक्रिया में आइसोसाइनाइड का प्रभावी रूप से उपभोग हुआ।
अभिक्रिया में संश्लेषित उत्पाद:
तालिका में बेंजोथायाज़ोल एसीटोनाइट्राइल की विभिन्न ऐल्डिहाइडों एवं आइसोसाइनाइडों के साथ नौवेंजेल योग अभिक्रिया के पश्चात 4+1 चक्रीय योग अभिक्रिया द्वारा प्राप्त परिणामों का सार प्रस्तुत किया गया है।
इलेक्ट्रॉन-आकर्षी समूह युक्त एरिल ऐल्डिहाइडों से संबंधित चक्रीय योग उत्पाद इलेक्ट्रॉन-दाता समूह युक्त ऐल्डिहाइडों की तुलना में अधिक लब्धि में प्राप्त हुए। सभी संश्लेषित उत्पाद पर्याप्त रूप से स्थाई पाए गए तथा उन्हें कमरे के तापमान पर कई सप्ताह तक संग्रहीत किया जा सकता है।
तालिका: बेंजो[d]पाइरोलो[2,1-b]थायाज़ोल विषमचक्रीय यौगिकों का संश्लेषण
क्र.सं.
क्रियाकारक 2
क्रियाकारक3
उत्पाद
समय (मिनट)
लब्धि (%)
1
60
90
2
55
92
3
60
90
4
90
84
5
90
86
6
50
88
7
55
88
8
55
86
9
100
86
10
100
84
सभी अभिक्रियाएँ ऐल्डिहाइड (1.0 समतुल्य), संबंधित अभिक्रियाशील पदार्थ (1.0 समतुल्य) तथा आइसोसाइनाइड (0.9 समतुल्य) को बेंजीन में पाइपरिडीन (0.1 समतुल्य) तथा एसिटिक अम्ल (0.2 समतुल्य) की उपस्थिति में 80°C पर अभिक्रिया कराकर सम्पन्न की गईं।
निष्कर्ष
संक्षेप में, एरिल तथा हेटेरोएरिल-प्रतिस्थापित बेंजो[d]पाइरोलो[2,1-b]थायाज़ोल हेटरोसाइकिलों के संश्लेषण की एक सरल एवं प्रभावी विधि विकसित की गई। संक्रमण धातु-मुक्त अंतःआणविक चक्रीय योग अभिक्रिया द्वारा कम समय में अच्छी लब्धि के साथ संघनित विषमचक्रीय यौगिक प्राप्त हुए।
विभिन्न क्रियाकारको के साथ अभिक्रियाएँ सामान्यतः स्वच्छ रूप से सम्पन्न हुईं तथा प्राप्त बेंजो[d]पाइरोलो[2,1-b]थायाज़ोल विषमचक्रीय यौगिकों को कॉलम क्रोमैटोग्राफी के बिना पृथक किया जा सका। अतः यह विधि बड़े पैमाने पर संश्लेषण के लिए उपयोगी हो सकती है।
सन्दर्भ:
हॉर्टन, डी. ए.; बॉर्नजी.टी.; स्माइथएम. एल. केमरेव. 2003, 103, 893।