महिलाओं के उत्तराधिकार एवं संपत्ति अधिकार: एक सामाजिक-कानूनी अध्ययन
DOI:
https://doi.org/10.29070/5qp0d818Keywords:
महिला अधिकार, उत्तराधिकार, संपत्ति अधिकार, लैंगिक समानता, व्यक्तिगत विधियाँ, सामाजिक न्याय, महिला सशक्तिकरणAbstract
महिलाओं के संपत्ति एवं उत्तराधिकार अधिकार किसी भी समाज में लैंगिक समानता, सामाजिक न्याय तथा आर्थिक सशक्तिकरण के महत्वपूर्ण सूचक माने जाते हैं। संपत्ति पर अधिकार व्यक्ति की आर्थिक स्वतंत्रता, सामाजिक प्रतिष्ठा तथा निर्णय लेने की क्षमता को सुदृढ़ बनाता है। भारतीय समाज में महिलाओं की स्थिति ऐतिहासिक रूप से जटिल रही है, जहाँ एक ओर संविधान समानता का अधिकार प्रदान करता है, वहीं दूसरी ओर सामाजिक परंपराएँ, रूढ़ियाँ तथा कुछ विधिक व्यवस्थाएँ महिलाओं के संपत्ति अधिकारों को सीमित करती रही हैं।
वर्तमान शोध-पत्र का उद्देश्य भारत में महिलाओं के उत्तराधिकार एवं संपत्ति अधिकारों का सामाजिक-कानूनी विश्लेषण करना है। अध्ययन में हिन्दू, मुस्लिम, ईसाई तथा पारसी व्यक्तिगत विधियों के अंतर्गत महिलाओं को प्राप्त संपत्ति एवं उत्तराधिकार अधिकारों का परीक्षण किया गया है। साथ ही संवैधानिक प्रावधानों, विधायी सुधारों तथा न्यायिक निर्णयों के माध्यम से महिलाओं के अधिकारों के विकास का विश्लेषण किया गया है। अध्ययन से स्पष्ट होता है कि यद्यपि विधिक स्तर पर महिलाओं को संपत्ति अधिकार प्रदान करने की दिशा में महत्वपूर्ण सुधार किए गए हैं, तथापि व्यवहारिक स्तर पर सामाजिक मानसिकता, जागरूकता का अभाव, आर्थिक निर्भरता तथा पारिवारिक दबाव जैसी चुनौतियाँ अब भी विद्यमान हैं। शोध यह निष्कर्ष प्रस्तुत करता है कि महिलाओं के वास्तविक सशक्तिकरण हेतु केवल विधायी सुधार पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन, कानूनी जागरूकता तथा प्रभावी क्रियान्वयन भी आवश्यक है।
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