डिजिटल युग में हिंदी भाषा एवं उसकी बोलियों का संरक्षण और संवर्धन

Authors

  • डॉ. अरविन्द सिंह तेजावत सहायक आचार्य, हिंदी विभाग, हरियाणा केंद्रीय विश्वविद्यालय, महेंद्रगढ़, हरियाणा Author

DOI:

https://doi.org/10.29070/hap13079

Keywords:

डिजिटल भाषा-विभाजन, यूनिकोड, भाषा-प्रौद्योगिकी, मशीन अनुवाद, भाषिक संग्रह, बोली-अभिलेखीकरण, संकटग्रस्त भाषाएँ, डिजिटल भाषा-मृत्यु

Abstract

डिजिटल प्रौद्योगिकी ने भाषाओं के अस्तित्व एवं विकास की शर्तों को मूलभूत रूप से परिवर्तित कर दिया है। जो भाषाएँ डिजिटल माध्यमों में पर्याप्त उपस्थिति नहीं बना पातीं, वे धीरे-धीरे प्रकार्यात्मक संकुचन की ओर बढ़ती हैं—इसी परिघटना को भाषाविज्ञान में "डिजिटल भाषा-मृत्यु" कहा गया है। प्रस्तुत शोध-पत्र इसी परिप्रेक्ष्य में हिंदी एवं उसकी बोलियों की स्थिति का परीक्षण करता है। अध्ययन में सर्वप्रथम डिजिटल भाषा-विभाजन की अवधारणा का विवेचन करते हुए हिंदी की डिजिटल यात्रा का कालक्रमिक विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है—आइ.एस.सी.आइ.आइ. से यूनिकोड तक और स्थिर संगणक से मोबाइल तक। तत्पश्चात भाषा-प्रौद्योगिकी के प्रमुख क्षेत्रों—मशीन अनुवाद, प्रकाशिक वर्ण-अभिज्ञान, वाक्-संश्लेषण एवं वाक्-अभिज्ञान, संगणकीय कोश एवं संग्रह-निर्माण—में हिंदी की उपलब्धियों एवं कमियों का आकलन किया गया है। अध्ययन का एक प्रमुख निष्कर्ष यह है कि हिंदी की डिजिटल स्थिति यद्यपि संतोषजनक रूप से सुदृढ़ हुई है, तथापि उसकी बोलियाँ—ब्रजभाषा, अवधी, बुंदेली, बघेली, कन्नौजी एवं अन्य—डिजिटल परिदृश्य में लगभग अनुपस्थित हैं। इस असमानता के दीर्घकालिक परिणाम गंभीर हैं, क्योंकि हिंदी की समृद्धि का मूल स्रोत उसकी बोलियाँ ही रही हैं। अंत में अभिलेखीकरण, संग्रह-निर्माण, समुदाय-आधारित सामग्री-सृजन एवं नीतिगत हस्तक्षेप संबंधी सुझाव प्रस्तुत किए गए हैं।

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Published

2026-04-01

How to Cite

[1]
“डिजिटल युग में हिंदी भाषा एवं उसकी बोलियों का संरक्षण और संवर्धन”, JASRAE, vol. 23, no. 2, pp. 563–576, Apr. 2026, doi: 10.29070/hap13079.