समानता के संवैधानिक सिद्धांत और महिलाओं के संपत्ति अधिकार: व्यक्तिगत विधियों का पुनर्मूल्यांकन
DOI:
https://doi.org/10.29070/g9t5sy76Keywords:
संवैधानिक समानता, महिलाओं के संपत्ति अधिकार, व्यक्तिगत विधियाँ, उत्तराधिकार, लैंगिक न्याय, महिला सशक्तिकरण, सामाजिक न्यायAbstract
भारतीय संविधान समानता, सामाजिक न्याय तथा मानव गरिमा के मूलभूत सिद्धांतों पर आधारित है। संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 16 तथा 21 सभी नागरिकों को समान अधिकार प्रदान करते हैं तथा लिंग के आधार पर किसी भी प्रकार के भेदभाव को निषिद्ध करते हैं। इसके बावजूद महिलाओं के संपत्ति एवं उत्तराधिकार अधिकारों के क्षेत्र में ऐतिहासिक रूप से अनेक असमानताएँ विद्यमान रही हैं, विशेष रूप से व्यक्तिगत विधियों (Personal Laws) के संदर्भ में। हिन्दू, मुस्लिम, ईसाई तथा पारसी व्यक्तिगत विधियों में महिलाओं को संपत्ति संबंधी अधिकार प्रदान किए गए हैं, किन्तु इन अधिकारों की प्रकृति, सीमा एवं प्रभावशीलता में पर्याप्त भिन्नताएँ पाई जाती हैं।
वर्तमान शोध-पत्र का उद्देश्य संवैधानिक समानता के सिद्धांतों के आलोक में महिलाओं के संपत्ति अधिकारों का विश्लेषण करना तथा विभिन्न व्यक्तिगत विधियों का पुनर्मूल्यांकन करना है। अध्ययन में यह परीक्षण किया गया है कि क्या वर्तमान व्यक्तिगत विधियाँ संविधान द्वारा प्रदत्त समानता एवं लैंगिक न्याय के मानकों के अनुरूप हैं। साथ ही, न्यायपालिका द्वारा समय-समय पर दिए गए महत्वपूर्ण निर्णयों एवं विधायी सुधारों का भी विश्लेषण किया गया है।
अध्ययन से यह निष्कर्ष निकलता है कि यद्यपि महिलाओं के संपत्ति अधिकारों के संरक्षण हेतु महत्वपूर्ण विधायी एवं न्यायिक प्रगति हुई है, तथापि व्यक्तिगत विधियों में विद्यमान कुछ असमानताएँ तथा सामाजिक बाधाएँ अभी भी वास्तविक लैंगिक समानता के मार्ग में अवरोध उत्पन्न करती हैं। इसलिए व्यक्तिगत विधियों के पुनर्मूल्यांकन तथा समानता-आधारित सुधारों की आवश्यकता स्पष्ट रूप से अनुभव की जाती है।
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