सीकर उपखण्ड एवं शेखावाटी के भित्ति-चित्रों का राजस्थान के अन्य स्थानीय भित्ति चित्रों से तुलनात्मक अध्ययन
DOI:
https://doi.org/10.29070/77h2ca08Keywords:
स्थानीय चित्रकला, राजस्थानी चित्रकला, भित्ति चित्रण परम्पराAbstract
राजस्थानी चित्रकला अपनी प्राचीनता के लिए जाना जाती है। जब राजस्थान की चित्रकला अपने प्रारंभिक दौर से गुजर रही थी तब अजन्ता परंम्परा भारत की चित्रकारी में एक नवजीवन का संचार कर रही थी। अजन्ता परम्परा के गुजराती चित्रकार सर्वप्रथम मेवाड़ तथा मारवाड़ में पहुँचे। इस समन्वय से चित्रकारी की मौलिक विधि में एक नवीनता का संचार हुआ जिसे मंडोर द्वार के गोवर्धन-धारण तथा बाडौली व नागदा गाँव की मूर्तिकला में सहज ही देखा जा सकता है। राजस्थान की समन्वित शैली के तत्वावधान में अनेक जैन-ग्रंथ चित्रित किये गये। सीकर उपखण्ड एवं शेखावाटी क्षेत्र के भित्ति-चित्र विशेष रूप से हवेलियों, मंदिरों, छतरियों और अन्य स्थापत्य स्मारकों से जुड़े हुए हैं। नवलगढ़, लक्ष्मणगढ़, मुकुंदगढ़, मंडावा आदि में स्मारक उदाहरण मिलते हैं। उन्नीसवीं और बीसवीं सदी की शुरुआत में व्यावसायिक समृद्धि के कारण हवेलियों के बाहरी और आंतरिक उद्योगों को बड़े पैमाने पर चित्रित किया गया था। इन रचनाओं में रामायण-महाभारत, कृष्णलीला, देवी-देवता, लोकनायक, पशु-पक्षी, राजदरबार, युद्ध, शिकार, विवाह, घरेलू जीवन और सांस्कृतिक संबंधों के साथ-साथ औपनिवेशिक काल की रेलगाड़ी, मोटरगाड़ी, साइकिल और सैनिक जैसे आधुनिक विषय भी दिए गए हैं। इस प्रकार शेखावाटी चित्रकला में परम्परा और आधुनिकता का विशिष्ट समन्वय दिखाई देता है।
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References
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21 परसरामपुरा की ठाकुर शार्दूलसिंह जी की छतरी जिसका निर्माण काल 1750 ई. के आस-पास हुआ था, विभिन्न भित्ति-चित्रों से सजी हुई है जिनकी शैली बैराठ व आमेर में भारमल की छतरी से काफी प्रभावित है।
22 नौ नारी कुंजर’ तथा ‘पंच नारी अश्व’ की चित्रकृतियाँ बिसाऊ में प्रायः 19वीं शती की हैं






