हर्षनाथ मंदिरः स्थापत्य और मूर्तिकला का सांस्कृतिक महत्व

Authors

  • रामसिंह सरावगं सहायक आचार्य, श्री कल्याण राजकीय कन्या महाविद्यालय, सीकरए एवं शोधार्थी, इतिहास एवं भारतीय संस्कृति विभाग, राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर, राजस्थान Author

DOI:

https://doi.org/10.29070/nrkrt739

Keywords:

हर्षनाथ मंदिर, स्थापत्य एवं मूर्तिकला, गर्भगृह, धार्मिक कला, सांस्कृतिक विरासत

Abstract

राजस्थान की सांस्कृतिक एवं कलात्मक परंपरा में मंदिर स्थापत्य का महत्वपूर्ण स्थान है। यहाँ निर्मित मंदिर केवल धार्मिक आस्था के केंद्र नहीं रहे, बल्कि तत्कालीन समाज, धर्म, कला, स्थापत्य तकनीक तथा मूर्तिकला की विकसित परंपराओं के साक्ष्य भी प्रस्तुत करते हैं। राजस्थान के मध्यकालीन मंदिरों में सीकर जिले के हर्ष पर्वत पर स्थित हर्षनाथ मंदिर विशेष रूप से उल्लेखनीय है। यह मंदिर अपनी स्थापत्य योजना, शिल्प-सज्जा, प्रतिमा-विधान तथा विविध देवी-देवताओं की मूर्तियों के कारण राजस्थान की मध्यकालीन कला का महत्वपूर्ण उदाहरण माना जाता है। हर्षनाथ मंदिर का संबंध शैव परंपरा से रहा है। मंदिर परिसर तथा उसके अवशेषों में शिव, पार्वती, गणेश, कार्तिकेय, नंदी, दिक्पाल, सुरसुंदरी तथा अन्य धार्मिक एवं आलंकारिक प्रतिमाओं के अंकन से तत्कालीन धार्मिक विचारधारा और शिल्प परंपरा का परिचय मिलता है। मंदिर की स्थापत्य संरचना में नागर शैली के अनेक प्रमुख तत्व दिखाई देते हैं। इसके स्थापत्य में ऊध्र्वमुखी संरचना, अलंकृत स्तम्भ, द्वार शाखाएँ, मंडप तथा विभिन्न प्रकार के शिल्पांकन विशेष आकर्षण के केंद्र है। प्रस्तुत शोध पत्र में हर्षनाथ मंदिर के स्थापत्य एवं मूर्तिकला का कला-ऐतिहासिक दृष्टि से अध्ययन किया गया है। इसमें मंदिर की योजना, निर्माण सामग्री, स्थापत्य शैली, अलंकरण, प्रतिमा-विधान, मूर्तियों के विषय-वस्तु तथा कलात्मक विशेषताओं का विश्लेषण किया गया है। 

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Published

2026-07-01

How to Cite

[1]
“हर्षनाथ मंदिरः स्थापत्य और मूर्तिकला का सांस्कृतिक महत्व”, JASRAE, vol. 23, no. 4, pp. 450–460, July 2026, doi: 10.29070/nrkrt739.